Bhagat Singh (भारत के वीर सपूत क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह)

Bhagat Singh (भारत के वीर सपूत क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह)

सरदार भगत सिंह, एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही हर एक हिन्दुस्तानि की रगों में देशभक्ति का खून दौड़ने लगता है। भगत सिंह एक ऐसा जांबाज वीर योद्धा जिसने मात्र 23 साल की उम्र में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए और अपने आप को देश के लिए बलिदान कर दिया। भगत सिंह को हम सब शहीद भगत सिंह के रूप में भी जानते है (28 सितंबर 1907 – 23 मार्च 1931) एक भारतीय समाजवादी और क्रांतिकारी थे। भगत सिंह को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारियों में से एक माना जाता है। इन्होंने देश की आज़ादी के लिए चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। दिसंबर 1928, में भगत सिंह और उनके एक सहयोगी(शिवराम राजगुरु) डोनो ने साथमिलकर लाहौर,ब्रिटिश भारत में एक 21 वर्षीय ब्रिटिश पुलिस के सुपरिंटेंडेंट अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी। क्योंकि उनका मानना था कि स्कॉट ने लोकप्रिय भारतीय राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की मृत्यु के लिए जिम्मेदार थे।

स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया था जिसके कारण लाला लाजपत राय घायल हो गए थे, और इसके दो हफ्ते बाद दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई थी। सॉन्डर्स को राजगुरु के एक शॉट से एक निशानेबाज ने गिरा दिया। उसके बाद भगत सिंह द्वारा कई बार गोली मार दी गई, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में आठ गोली के घाव दिखाई दे रहे थे। सिंह के एक सहयोगी चंद्र शेखर आजाद ने एक भारतीय पुलिस कांस्टेबल चनन सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसने सिंह और राजगुरु का पीछा करने का प्रयास किया।

सिंह ने पहले लाहौर में सॉन्डर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। सिंह ने असेम्बली में बम फेंककर भी दौड़ने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप उन्हें 23 मार्च 1931 को उनके दो अन्य सहयोगियों, राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी पर चढ़ा दिया गया। पूरे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया। उस दिन से हर साल 23 मार्च 1931 वीर सपूत क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह दिवस के रूप में जाना जाता है। शहीद दिवस के रूप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है।

यह दिवस न केवल देश के प्रति सम्मान और हिंदुस्तानी होने का गौरव अनुभव कराता है, बल्कि वीर सपूतों के बलिदान को भीगे मन से श्रृद्धांजलि देता है।

जन्म,परिवार और परिवेश

भगत सिंह(एक संधू जाट सिख) का जन्म 28 सितंबर,1907 में चाक नंबर 105 जीबी, गाँव बंगा , पंजाब भारत के पंजाब प्रांत के जिले यलपुर (अब पाकिस्तान में) में जरावाला तहसील में हुआ था । उनकी माता का नाम विद्यावती कौर और उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था । उनका परिवार एक [{सिक्ख}] और पूर्णतः आर्य समाजी परिवार था ।

उनका परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय था। उनके दादा, अर्जुन सिंह ने स्वामी दयानंद सरस्वती के हिंदू सुधारवादी आंदोलन, आर्य समाज का अनुसरण किया, जिसका भगत पर काफी प्रभाव पड़ा था। करतार सिंह सरभ और हर दयाल के नेतृत्व में उनके पिता और चाचा ग़दर पार्टी के सदस्य थे। उनके खिलाफ लंबित अदालती मामलों के कारण अजीत सिंह को निर्वासन में डाल दिया गया था, जबकि स्वर्ण सिंह की 1910 में लाहौर में जेल से रिहाई के बाद मृत्यु हो गई थी।

1923 में, सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज में शामिल हो गए, जहाँ उन्होंने नाटकीय समाज की तरह पाठ्येतर गतिविधियों में भी भाग लिया। अमृतसर में13 अप्रैल 1919 में, जब वह 12 साल के थे, उस समय पर हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। जिसके कारन भगत सिंह ने नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।

भारत के वीर सपूत भगत सिंह

वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में भी शामिल हुए, जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल और शाहिद अशफाकल्लाह खान जैसे प्रमुख नेता थे। एक साल बाद, अरेंज मैरिज से बचने के लिए, सिंह कोवनपोर भाग गए । और उन्होंने एक पत्र पीछे छोड़ दिया, उन्होंने कहा:

“मेरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए, कुलीनों के लिए समर्पित रहा है। इसलिए, कोई आराम या सांसारिक इच्छा नहीं है जो अब मुझे लुभा सकती है।

जेल के दिन

Jail में भगत सिंह करीब २ साल रहे। इस दौरान वे अपने क्रान्तिकारी विचार लेख लिखकर व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उस दौरान लिखे गये उनके लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने मजदूरों के लिए लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। सिंह ने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ? जेल में भगत सिंह ने उनके साथियों के साथ मिलकर 7 दिनों तक भूख हडताल भी की। जिसमे उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

फांसी

अदालत ने भगत सिंह को 26 अगस्त, 1930 को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई।

इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सिंह की सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। उसके बाद महात्मा गांधी ने भी भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु 17 फरवरी,1931 को वायसराय से बात की फिर आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्योंकि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।

फांसी का आदेश

23 मार्च 1931 को शाम के करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दोनों साथियों सुखदेवराजगुरु को फाँसी दे दी गई। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने उनसे कहा था- “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – “ठीक है चलो अब।”

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इस डर से अंग्रेजों ने पहले इन तीनो के मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ उन्हें घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो दौड़ते हुए वहा आये । इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाशों के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित किया और विधिवत दाह संस्कार किया। और इसके बाद भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये।

फिल्में और टेलीविजन

कई फिल्मों में सिंह के जीवन और समय को चित्रित किया गया है। उनके जीवन पर आधारित पहली फ़िल्म शहीद-ए-आज़ाद भगत सिंह (1954) थी जिसमें प्रेम आबेद ने सिंह की भूमिका निभाई थी, जिसके बाद शहीद भगत सिंह (1963) ने शम्मी कपूर द्वारा शहीद भगत सिंह, (1965) की भूमिका निभाई, जिसमें मनोज कुमार ने भगत सिंह और अमर शहीद भगत सिंह (1974) को चित्रित किया जिसमें सोम दत्त सिंह का चित्रण है। सिंह के बारे में तीन फ़िल्में 2002 में शहीद-ए-आज़म, 23 मार्च 1931: शहीद और द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह रिलीज़ हुईं जिसमें सिंह की भूमिका क्रमशः सोनू सूद, बॉबी देओल और अजय देवगन ने निभाई थी।
2008 में, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (NMML) और एक्ट नाउ फॉर हार्मनी एंड डेमोक्रेसी (ANHAD), एक गैर-लाभकारी संगठन, ने भगत सिंह पर 40 मिनट की डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया, जो कि गौहर रज़ा द्वारा निर्देशित इंक़लाब के लिए बनाई गई थी।

गीत

राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा निर्मित, देशभक्तिपूर्ण हिंदुस्तानी गीत, “सरफ़रोशी की तमन्ना (“बलिदान करने की इच्छा”) और “मेरा रंग दे बसंती चोला काफी हद तक सिंह से जुड़े हैं और कई संबंधित फिल्मों में इस्तेमाल किए गए हैं।

अन्य

1968 में, सिंह की 61 वीं जयंती के उपलक्ष्य में भारत में एक डाक टिकट जारी किया गया था। 2012 में संचलन के लिए उन्हें याद करते हुए ₹5 का सिक्का जारी किया गया था।

देशभक्तो को जो लोग पागल समझते है उनसे कह दो……

“सीने पर जो जख्म हैं सब फूलों के गुच्छे हैं हमें पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं. “

|| जय हिन्द वन्दे मातरम ||

This Post Has 12 Comments

  1. Nice sir

  2. इन्क़लाब जिन्दाबाद🇮🇳🇮🇳🇮🇳

  3. जय हिन्द वन्दे मातरम

  4. True legend

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  10. जय हिन्द वन्दे मातरम

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